चुनाव: पहले मजबूत नजर आ रही LDF आखिरी 10 दिनों में पिछड़ी

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केरल: केरल में 140 सीटों पर करीब 74% मतदान हुआ है। 2016 के विधानसभा चुनाव में 77.53% हुआ था। इसके साथ ही अब हर किसी की नजर नतीजों पर है। बहरहाल, नतीजे 2 मई को आएंगे। इससे पहले इस चुनाव का यदि एनालिसिस करें, तो केरल की राजनीति के कई पहलू दिखाई देते हैं। यहां एक बार फिर सरकार बदलती दिखाई दे रही है।

दरअसल, यहां का मतदाता काफी पढ़ा-लिखा है, इसलिए केरल देश का सबसे ज्यादा पॉलिटिकली अवेयर स्टेट है। यहां के वोटर्स सिर्फ लोकल मुद्दों पर ही नहीं, देश और दुनिया के मुद्दों पर भी नजर रखते हैं। यहां की महिलाएं घर के पुरुषाें के कहने पर वोट नहीं डालती हैं। बल्कि वे अपने विवेक से सोच-समझकर प्रत्याशी चुनती हैं। यहीं नहीं, यहां की महिलाएं हमेशा करीब 80% सीटों पर पुरुषों से वोटिंग करने में भी आगे रहती हैं। मंगलवार को हुई वोटिंग में भी यही ट्रेंड देखने को मिला।

कैसे आखिरी 10 दिनों में बदल गए समीकरण

केरल में मतदान से पहले आखिरी 10 दिनों में माहौल, समीकरण, मुद्दे और राजनीति काफी बदल गई। तमाम ओपिनियन पोल्स में राज्य में दोबारा सरकार बनाती दिख रही एलडीएफ वोटिंग आते-आते पिछड़ गई। इसका सीधा फायदा यूडीएफ को होता दिखाई दे रहा है। इसी का असर है कि शुरू में काफी एग्रेसिव दिख रहे सीपीएम पार्टी नेता आखिरी वक्त में काफी डिफेंसिव नजर आने लगे। सतारूढ़ सीपीएम को सबसे ज्यादा नुकसान मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के रवैये से होता दिख रहा है।

दरअसल, विजयन ने पहले टू टर्म नॉर्म के नाम पर पार्टी के दिग्गज नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया, फिर उन्हें कैंपेन से भी दूर रखा। शुरू में तो ये नेता चुप रहे, लेकिन चुनाव आते-आते उनकी नाराजगी बाहर आ गई। विजयन ने डैमेज कंट्रोल की काफी कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं दिख रहे हैं। वहीं, 10 दिन पहले तक जो मुद्दा राज्य के चुनावी महौल से लगभग गायब था, वह आखिरी वक्त में बड़ा रोल प्ले कर गया। इसकी शुरुआत विजयन सरकार के देवासम् बोर्ड मंत्री कदाकापल्ली सुरेंद्रन ने की। उन्होंने सबरीमाला आंदोलन के दौरान जो कुछ सरकार द्वारा हुआ था, उस पर अफसोस जताया था। इसके बाद विजयन ने कई बार सफाई दी, लेकिन विपक्ष काे मुद्दा मिल गया।

फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल की अपनी रैली में सबरीमाला को लेकर स्वामी शरणम् अयप्पा का नारा लगाकर भक्तों में जोश भरने और ध्रुवीकरण की कोशिश कर डाली। इस पर विजयन ने मोदी के सेक्युलरिज्म पर सवाल उठा दिए। इससे भी सबरीमाला के भक्तों में गलत संदेश गया। रही सही कसर वोटिंग के दिन सुबह-सुबह नायर सर्विस सोसायटी (एनएसएस) के चीफ जी सुकुमारन ने पूरी कर दी। उन्होंने वोट डालने के बाद कहा, ‘लोगों को उसे वोट करना चाहिए जो सेक्युलरिज्म, डेमोक्रेसी, सोशल जस्टिस और लोगों के विश्वास की सुरक्षा कर सके। जो कि एलडीएफ सरकार करने में नाकाम रही है। सबरीमाला मुद्दे पर हुए आंदोलन और लोगों के विरोध को शांत नहीं होने देना चाहिए।’

सुकुमारन के बयान ने पूरे केरल की राजनीति में भूचाल लाने का काम किया। इसके तुरंत बाद कांग्रेस और भाजपा समेत सभी पार्टियों ने इस बयान को लपकने की कोशिश की। वहीं, विजयन ने बयान पर नाराजगी जताते हुए कहा कि भगवान उसका साथ देते हैं, जो लोगों के लिए काम करता है।

दरअसल, केरल में करीब 20% वोटर नायर कम्युनिटी से हैं। खासकर दक्षिण केरल के हिस्से में। नायर कम्युनिटी राज्य की 30 सीटों पर निर्णायक हैं। वहीं, कांग्रेस पार्टी के यूनाइटेड कैंपेन से भी माहौल काफी बदला है। खासकर, राहुल और प्रियंका गांधी के व्यापक कैंपेन से लोगों के नजरिये में बदलाव दिखा। कांग्रेस को यदि यहां फायदा होगा तो उसकी एकमात्र वजह राहुल गांधी का फेस है। राहुल ने केरल में तमाम छोटी रैलियां, रोड शो किए। इसके साथ ही उन्होंने ऐसी एक्टीविटीज कीं जिसने सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित किया। चाहे वो स्वीमिंग हो या डिनर डिप्लोमैसी या फिर ट्रैक्टर-ऑटो ट्रैवलिंग, स्टूडेंट डायलॉग या फिर छोटे बच्चे को एयरप्लेन में ले जाना हो। राहुल के दम पर ही आम चुनाव में कांग्रेस ने यहां की 20 में से 19 सीटें जीती थीं।

सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च (सीपीपीआर) के चेयरमैन डॉक्टर धनुराज भी कहते हैं कि आखिर के एक हफ्ते में यूडीएफ ने अपनी पोजीशन को काफी स्ट्रांग कर लिया। एनएसएस चीफ सुकुमारन के बयान के बाद तो एलडीएफ को बड़ा सेटबैक लगा है, जिस तरह से विजयन ने उस पर रियेक्ट और अटैक किया। वोटिंग के दिन इस तरह के बयान से सीपीएम को काफी नुकसान संभव है। अब यूडीएफ और एलडीएफ के बीच फाइट काफी टफ हो गई है। यहां वैसे भी दो नरेटिव हैं, पहला कि किसी भी सरकार का कंटीन्यू करना यहां के लोग ठीक नहीं मानते हैं। बहुत से लोग मानते हैं कि केरल जैसे राज्य में वे किसी सरकार के एसेट नहीं हो सकते हैं। वे मानते हैं कि हर पांच साल में चेक एंड बैलेंस के लिए सरकार बदलनी चाहिए, ताकि सत्ता जनता के हाथ में रहे।

आखिर के तीन-चार दिन में सीपीएम द्वारा यह सेट करने की कोशिश की गई कि विजयन को बतौर सीएम के तौर पर कंटीन्यू करना चाहिए, न कि सीपीएम और एलडीएफ को। बहुत से बड़े नेताओं ने विजयन को लेकर कमेंट किए कि वे टीम के कैप्टन हैं, उनका जीतना जरूरी है, पार्टी का नहीं। इसके बाद सीपीएम का थिंक टैंक बहुत डिफेंसिव हो गया। सीपीएम के मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि सबरीमाला क्षेत्र में उनके कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

धनुराज कहते हैं कि देखिए सबरीमाला शुरू में बड़ा इश्यू नहीं था, पर चुनाव के दिन बहुत बड़ा बन गया, केरल में करीब 55% हिंदू वोटर्स हैं, ये सबरीमाला के भक्त हैं। इनमें से 20% नायर, 30% इझवास कम्युनिटी के लोग हैं, ये यहां अपरकास्ट हैं। जबकि 5% एससी, एसटी हिंदू वोटर्स हैं। मुझे लगता है कि सबरीमाला का फायदा यूडीएफ और भाजपा को ही होगा। एलडीएफ को नहीं होगा।

कन्नूर के पॉलिटिकल एनालिस्ट सिहाद कहते हैं कि यहां कि महिलांए डिसाइडिंग फैक्टर बन गई हैं। उनका कहना है कि उन्होंने विजयन के चेस्ट को बहुत पेनफुल किक मारा है, क्योंकि इस सरकार का सबसे अच्छा डिपार्टमेंट हेल्थ था, जो केके शैलेजा के पास था, सबसे बुरा डिपार्टमेंट होम और पुलिस विजयन के पास था। विजयन कन्नूर और कोझिकोड के कुछ इलाके में तो खुद और सीपीएम को जिता ले जाएंगे, लेकिन मालाबार के बाकी जगहों पर हारने वाले हैं।

वरिष्ठ पत्रकार बाबू पीटर का कहना है कि यूडीएफ सरकार बनाने जा रही है। यूडीएफ ने ओपिनियन पोल्स को पीछे छोड़कर अच्छा कमबैक किया है। खासकर, साउथ और सेंट्रल केरल में। बाकी नाॅर्थ केरल में उसकी सहयोगी पार्टी मुस्लिम का पहले से दबदबा है। जहां तक बात भाजपा की है, तो उसके पास संभावनाएं काफी कम हैं, उसके वोट में एक बार फिर इजाफा हो सकता है, लेकिन वह यहां डिसाइडिंग फैक्टर नहीं है। भाजपा का कैडर यहां काफी कमजोर है, खासकर उसके ग्राउंड लेवल के लीडर आपस में बंटे हुए नजर आए। वे एक-दूसरे को सपोर्ट नहीं कर रहे थे। यहां हर बूथ पर भाजपा का कार्यकर्ता भी नहीं है, न ही कैंडिडेट की पहुंच है, ऐसे में जीतने का सवाल ही पैदा नहीं होता है।

साउथ केरल क्या कह रहा है?

केरल में इस बार 73 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है। जो पिछले बार की तुलना में कम है। 2016 में 77 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई थी।
केरल में इस बार 73 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है। जो पिछले बार की तुलना में कम है। 2016 में 77 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई थी।
इलाके के हिसाब से देखें तो केरल तीन हिस्सों में बंटा है। पहला हिस्सा है- साउथ केरल का। यहां के 4 जिलों में 42 सीटें आती हैं। इसी इलाके में त्रिवेंद्रम और पत्नामिट्‌टा जिला है। भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीदें यहीं से हैं। खासकर त्रिवेंद्रम में। यहां से पिछली बार भाजपा को एक सीट मिली थी। इस बार भाजपा यहां दो से तीन सीट जीत सकती है। यूडीएफ को पिछली बार सिर्फ 8 सीटें मिली थीं। इस बार वह यहां 20 से 25 सीटें जीत सकती है। वहीं, एलडीएफ को इस बार यहां भारी नुकसान होता दिख रहा है। वह 15 से 20 सीटें जीत सकती है। पिछली बार उसे यहां 32 सीटें मिली थीं।

सेंट्रल केरल किसके साथ जाएगा?

इस इलाके के 5 जिलों में 50 सीटें हैं। यह परंपरागत तौर पर हमेशा से यूडीएफ का गढ़ रहा है। इसी इलाके में एर्नाकुलम और पलक्कड़ जिले भी हैं। इस बार यहां यूडीएफ को 28 से 33 सीटें मिल सकती हैं। पिछली बार उसे यहां 19 सीटें मिली थीं। एलडीएफ को यहां 12 से 15 सीटें मिल सकती हैं। पिछली बार उसे 31 सीटें मिली थीं। वहीं, भाजपा का यहां इस बार खाता खुल सकता है। भाजपा एक से दो सीट जीत सकती है।

नॉर्थ केरल की क्या है राय?

नॉर्थ केरल ही प्योर मालाबार इलाका कहलाता है। यहां पांच जिलों में 48 सीटें हैं। यह एलडीएफ में सीपीएम और यूडीएफ में मुस्लिम लीग का गढ़ है। इस बार यहां यूडीएफ 22 से 27 सीटें जीत सकती है। पिछली बार उसे 20 सीटें मिली थीं। जबकि एलडीएफ 15 से 20 सीट जीत सकती है। पिछली बार उसे 28 सीटें मिली थीं। वहीं, भाजपा का यहां भी खाता खुल सकता है, वह एक से 2 सीट जीत सकती है। जिस सीट पर उसकी जीत की सबसे ज्यादा संभावना है, वह कासरगोड़ की मंजेश्वरम सीट है।